Thursday, June 28, 2012

मंत्री वाले दिन बीते रे भैया!

अब प्रणव मुखर्जी केंद्र सरकार के लिए इतिहास की वस्तु हो जाएँगे! लेकिन संकटमोचक के विदा लेने के बाद अब उनके तमतमाए तेवर संसद में नहीं दिखेंगे. एक कठपुतली प्रधानमंत्री के सशक्त सहारे के रूप में उन्होंने अपनी भूमिका का सम्यक निर्वहन किया. राष्ट्रपति चुनाव में वे जीतें या हारें (अगर १९६९ की तरह 'आत्मा की आवाज़' पर मतदान हो तो पता नहीं क्या परिणाम हो. यह परंपरा भी तो उनकी ही पार्टी ने शुरू की थी जब अपने अधिकृत उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को वी वी गिरि द्वारा इंदिरा गाँधी ने हरवा दिया था.) अब यह तय है कि वे प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे. जीते तो रायसीना हिल अन्यथा राजनीति की अंधी खाई में! इस तीर से सोनिया गाँधी ने अपने युवराज के लिए रास्ता और साफ कर लिया है.

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